डॉ. अनिल सिंघवी, MD · 35+ साल का अनुभव · मध्य प्रदेश के पहले हेमेटोलॉजी सेंटर के संस्थापकइंदौर में क्लिनिक आकर या वीडियो कॉल पर सलाह लें।
लिंफोमा लिम्फोसाइट्स से शुरू होता है, जो एक तरह के सफ़ेद रक्त कण हैं। यह लिम्फ नोड (गाँठों), तिल्ली, बोन मैरो या दूसरे अंगों में हो सकता है। इसके दो बड़े समूह हैं (हॉजकिन लिंफोमा और नॉन-हॉजकिन लिंफोमा), और इनके कई उप-प्रकार हैं जो अलग-अलग तरह से बढ़ते हैं और इलाज पर अलग असर दिखाते हैं।
बढ़ी हुई स्टेज में भी लिंफोमा इलाज पर बहुत अच्छा असर दिखाता है। हॉजकिन लिंफोमा ज़्यादातर मरीज़ों में पूरी तरह ठीक हो जाता है, और तेज़ी से बढ़ने वाले कई नॉन-हॉजकिन लिंफोमा भी आज की कीमो-इम्यूनोथेरेपी से ठीक हो सकते हैं।
बीमारी पक्की करने के लिए बढ़ी हुई गाँठ की बायोप्सी ज़रूरी है, जिसे अनुभवी पैथोलॉजिस्ट देखकर सही प्रकार बताते हैं। स्टेज जानने के लिए खून की जाँच, ज़रूरत हो तो बोन मैरो जाँच, और CT या PET-CT स्कैन किए जाते हैं।
ज़्यादातर लिंफोमा का इलाज कीमोथेरेपी और इम्यूनोथेरेपी (जैसे B-सेल लिंफोमा में रिटुक्सिमैब) को मिलाकर होता है। यह साइकिल में दिया जाता है, आम तौर पर डे-केयर में। कुछ मामलों में रेडिएशन भी जोड़ा जाता है। इलाज इस तरह तय किया जाता है कि ठीक होने की संभावना सबसे ज़्यादा हो और लंबे समय के साइड इफ़ेक्ट सबसे कम।
यह जानकारी सिर्फ़ आम जानकारी के लिए है, यह डॉक्टर से सलाह की जगह नहीं ले सकती। हर मरीज़ अलग होता है, और सही इलाज पूरी जाँच के बाद ही तय किया जा सकता है।
डॉ. अनिल बताते हैं कि नए इलाज से कैंसर अब कैसे ठीक हो सकता है।
कैंसर और खून की बीमारियों के इलाज में 30 साल से ज़्यादा अनुभव वाले विशेषज्ञ से सलाह लें। सेकंड ओपिनियन और ऑनलाइन कंसल्टेशन भी उपलब्ध है।
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