डॉ. अनिल सिंघवी, MD · 35+ साल का अनुभव · मध्य प्रदेश के पहले हेमेटोलॉजी सेंटर के संस्थापकइंदौर में क्लिनिक आकर या वीडियो कॉल पर सलाह लें।
फेफड़ों का कैंसर साँस की नलियों या फेफड़ों के ऊतक में शुरू होता है। धूम्रपान इसका सबसे बड़ा कारण है, हालाँकि धूम्रपान न करने वालों को भी, ख़ासकर महिलाओं को, यह होता है। शुरुआत में अक्सर कोई लक्षण नहीं होते, इसलिए कई मरीज़ों में इसका पता देर से चलता है।
पिछले दस सालों में इलाज में बड़ा बदलाव आया है। ट्यूमर में ख़ास जीन बदलावों की जाँच करके हम कई मरीज़ों को टारगेटेड गोलियाँ या इम्यूनोथेरेपी दे पाते हैं, जिनके नतीजे पुरानी कीमोथेरेपी से कहीं बेहतर और साइड इफ़ेक्ट कहीं कम हैं।
जाँच में छाती का CT स्कैन और बायोप्सी (ब्रोंकोस्कोपी से या CT की मदद से सुई द्वारा) होती है, जिससे कैंसर का प्रकार पक्का होता है। बायोप्सी की मॉलिक्यूलर जाँच (EGFR और ALK जैसे म्यूटेशन के लिए) और PD-L1 टेस्ट से तय होता है कि टारगेटेड थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी या कीमोथेरेपी में से क्या दिया जाए। स्टेज जानने के लिए स्कैन किए जाते हैं।
शुरुआती स्टेज में ऑपरेशन या रेडिएशन से बीमारी ठीक हो सकती है। बढ़ी हुई बीमारी में इलाज ट्यूमर के प्रकार के हिसाब से तय होता है: म्यूटेशन वाले कैंसर में टारगेटेड गोलियाँ, शरीर की अपनी रोग-प्रतिरोधक ताक़त को ट्यूमर से लड़ाने के लिए इम्यूनोथेरेपी, और आधुनिक कीमोथेरेपी, अक्सर इन्हें मिलाकर। इनमें से कई इलाज डे-केयर में दिए जाते हैं।
यह जानकारी सिर्फ़ आम जानकारी के लिए है, यह डॉक्टर से सलाह की जगह नहीं ले सकती। हर मरीज़ अलग होता है, और सही इलाज पूरी जाँच के बाद ही तय किया जा सकता है।
डॉ. अनिल बताते हैं कि नए इलाज से कैंसर अब कैसे ठीक हो सकता है।
कैंसर और खून की बीमारियों के इलाज में 30 साल से ज़्यादा अनुभव वाले विशेषज्ञ से सलाह लें। सेकंड ओपिनियन और ऑनलाइन कंसल्टेशन भी उपलब्ध है।
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